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प्रणय

जीवन की साँझ पर खड़ी अनन्या, जुलाई महीने की ज़ोरदार बारिश को निहार रही थी , ये बारिश भी कितनी रोमांचक है , खुद तो आकर बूंदे बरसाती ही है, उसके साथ साथ उन बूंदों

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जिंदगी

आज सुबह खिड़की पर चाय का प्याला लिए बैठी थी पीछे मुड़कर देखा तो वह खड़ी थी पता है कौन? जिंदगी मैंने पूछा -कैसे आना हुआ? वह बोली- तुम तो याद करती नहीं सोचा मैं

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ज़िद है

अब फिर से खुदको तलाशने की ज़िद है देखा मिलो तक,पर दिखती नहीं कोई हद है इन ठंडी बयारों में गर्माहट की ज़द है तुम्हारी पुकार में आवाज़ मद्धम एहसास बेहद है अपने आकाश को

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करवा चौथ

सुमि तीन दिन से बाजार के चक्कर काट रही थी। साड़ी ,बिंदी,मैचिंग झुमके क्या नहीं ख़रीदा उसने ? उसकी बेटी अदिति उसको देख- देख के हैरान हुयी जा रही थी, मम्मी को अचानक ये क्या

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मास्क

बीना रोज़ घर और ऑफिस का काम करते करते थक सी गई थी तो उसने सोचा आज क्यों न आधे दिन की छुट्टी ले लू। किसी कैफ़े में शांति से बैठकर कॉफ़ी पीते हुए कुछ

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ये ज़िन्दगी का तोहफा परेशानियों में नहीं बिताना मुझको

कल क्या होगा सोच कर आज नहीं गवाना मुझको ये ज़िन्दगी का तोहफा परेशानियों में नहीं बिताना मुझको मेरे हिस्से की सारी खुशिया दोनों हाथो से बटोरूँगी इस दिल के किसी भी अरमान को अब

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थोड़ा खुद के लिए जिया तो क्या गुनाह किया।

थोड़ा खुद के लिए जिया तो क्या गुनाह किया सबके लिए हमने क्या क्या फ़ना किया माना पुकारेंगे मतलबी हमें ये लोग जब घुट रहे थे हम जब मर रहे थे हम तो इन्होने क्या

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